देह व्यापार अपराध नहीं? सुप्रीम कोर्ट की सोच ने पुलिस और सिस्टम को दिखाया आईना

Anchal Sharma
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सेक्स वर्कर होना गुनाह नहीं—बच्चों से लेकर सम्मान तक, कोर्ट ने तय की इंसानियत की लकीर

डिजिटल डेस्क | आंचलिक ख़बरें |

आज हम उस सच्चाई पर बात कर रहे हैं, जिस पर समाज अक्सर चुप रह जाता है। ऐसे पेशे की, जिसे लोग नजरअंदाज करते हैं, लेकिन कानून ने जिसे सम्मानित पेशे का दर्जा दिया है। सुप्रीम कोर्ट की यह सोच आज भी उतनी ही प्रासंगिक और जरूरी है, क्योंकि यह फैसला याद दिलाता है कि सम्मान पेशे से नहीं, इंसान होने से मिलता है।

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि सेक्स वर्क यानी देह व्यापार भी एक प्रोफेशन है और इसमें शामिल महिलाएं इस देश की नागरिक हैं। उन्हें गरिमा, सुरक्षा और कानून की बराबर हिफाजत मिलनी चाहिए।
अदालत के अनुसार, जो महिलाएं बालिग हैं और अपनी मर्जी व सहमति से सेक्स वर्क कर रही हैं, उनके खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। पुलिस को उनके काम में बेवजह हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

क्या अपराध है और क्या नहीं?

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना अपराध नहीं है।
हालांकि, वेश्यालय चलाना या इस पेशे का व्यापारीकरण करना अपराध की श्रेणी में आता है। यानी कोई व्यक्ति या संस्था इस पेशे को व्यवसायिक रूप से संचालित नहीं कर सकती।

बच्चों के अधिकारों पर भी साफ संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई महिला सेक्स वर्कर है, उसके बच्चे को उससे अलग नहीं किया जा सकता।
अगर बच्चा अपनी मां के साथ रहता है, तो इससे यह साबित नहीं होता कि वह तस्करी का शिकार है। ऐसी सोच न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि इंसानियत के भी खिलाफ है।

पुलिस को संवेदनशील बनने के निर्देश

अदालत ने पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि किसी सेक्स वर्कर के साथ अपराध या यौन उत्पीड़न होता है, तो उसे वही मेडिकल और कानूनी सहायता मिलनी चाहिए, जो किसी भी अन्य महिला पीड़ित को मिलती है।
पुलिस को उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार करना होगा—
न गाली-गलौज
न शारीरिक हिंसा
न किसी तरह का दबाव
मीडिया के लिए भी गाइडलाइन
सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को भी जिम्मेदारी का एहसास दिलाया है। सेक्स वर्कर्स से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान उनकी पहचान उजागर नहीं की जानी चाहिए। पहचान सामने आने से उनकी सुरक्षा और जीवन दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।

आज सवाल यह नहीं है कि कानून क्या कहता है, सवाल यह है कि क्या समाज और सिस्टम उस सोच को जमीन पर उतार पा रहे हैं?

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